एनपीए की समस्या #14

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एनपीए क्या है

  • कोई ऋण तब एनपीए घोषित होता है जब कर्जदार 90 दिन तक लगातार मूलधन या ब्याज नहीं दे पाता |
  • कृषि ऋणों के लिए ये फसल चक्र पर निर्भर करता है |

 

 

 कुछ तथ्य (आंकड़े )

  • आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सरकारी और निजी बैंकों में एनपीए क्रमशः लगभग34 लाख करोड़ और 1.38 लाख करोड़ है .(कुल लगभग 9.6 लाख करोड़ )
  • कुल एनपीए सारी आस्तियों का लगभग ~9.1 % है | (सरकारी बैंकों में 12%).
  • कुल 6 लाख करोड़ में से 10 व्यापार समूह  ~4 लाख करोड़ के कर्जदार हैं |
  • ब्रिक्स (BRICS) में ये रूस में सर्वाधिक है | भारत का दूसरा स्थान है |

 

सर्वाधिक जोखिम वाले क्षेत्र

रिज़र्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट  मूलभूत  धात्विक और सीमेंट उद्योगों को सर्वाधिक ऋण ग्रस्त बताती है | साथ ही निर्माण, आधारिक संरचना और वाहन उद्योग भी एनपीए के लिए काफी जिम्मेदार हैं |

एनपीए के कारण

उद्यम पक्ष के कारण:

  • कंपनी द्वारा किसी प्रयोजन से लिया गया ऋण किसी अन्य कार्य में खर्चा होना
  • व्यवसाय का दिवालिया हो जाना
  • सरकारी बैंकों में कुल एनपीए का लगभग ~21% ऐसे बकायेदारों का है जो क़र्ज़ चुकाने में अनिच्छुक हैं |
  • बिजली(राज्य बिजली बोर्ड ), स्टील, आधारिक संरचना , वस्त्र, खान जैसे कठिनाई से गुजर रहे क्षेत्र |
  • वस्तु व सेवा कर तथा विमुद्रीकरण के कारण व्यापक आर्थिक मंदी |

बैंक पक्ष के कारण :

  • ऋण देने के समय साख का त्रुटिपूर्ण मूल्याङ्कन
  • सरकारी बैंक कई बाध्यताओं के कारण ऐसे ऋण भी देते हैं जहाँ कोई शुद्ध व्यापारिक कारण ऋण देने का नहीं है |
  • राजनितिक दबाव में ऋण देना | जैसे की सरकारी बैंक आधारिक संरचना जैसे क्षेत्र में भी ऋण देने को बाध्य थे |
  • आर्थिक समृद्धि के समय बिना सम्यक जांच पड़ताल के ताबड़तोड़ ऋण वितरण |
  • लेखा में हेरफेर: आस्ति गुणवत्ता समीक्षा ने छुपे हुए एनपीए की समस्या को उजागर किया | ये एनपीए बैंक के तुलनपत्र में ठीक से नजर नहीं आते थे और साल दर साल बढ़ते चले गए थे |

 

एनपीए का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • एनपीए बैंक के संसाधन घटाते हैं और उनकी ऋण वितरण क्षमता को प्रभावित करते हैं क्यूंकि बैंक को घाटा पूरा करने हेतु संसाधन रखने पड़ते हैं |(दोहरे तुलनपत्र की समस्या का एक पक्ष )
  • बैंक कंपनियों को घाटे के डर से ऋण वितरित नहीं करते (दोहरे तुलनपत्र की समस्या का दूसरा पक्ष).
  • सरकार पर पुनर्पूंजीकरण का दबाव बढ़ता है |(वित्तीय घाटा बढ़ता है )
  • उपरोक्त सभी स्थितियां आर्थिक अस्थिरता और मंदी के लिए उपयुक्त परिस्थितियों का निर्माण करती हैं |

सरकार व रिज़र्व बैंक द्वारा उठाये गए कदम

  • सरकार ने बैंकों में रु. २.11 लाख करोड़ के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा की गयी है |(इन्द्रधनुष, ज्ञान संगम )
  • बैंक प्रशासन पर बनी PJ Nayak समिति की सिफारिशें कार्यान्वित की जा रही हैं | उदाहरण :- बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना से सरकारी बैंकों के पेशेवर और स्वतंत्र प्रबंधन में सहायता होगी |
  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता २०१६ को द्रुत समाधान के लिए लाया गया है |
  • रिज़र्व बैंक ने कई पहल की हैं जैसे S4A योजना , आधारिक ऋणों हेतु 5:25 योजना , सामरिक ऋण पुनर्गठन आदि .

 

एनपीए मुद्दे का समाधान न होने के कारण  :

 

  • रिज़र्व बैंक के कदमों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली CDR, SDR, S4A, 5-24 आदि योजनायें एनपीए मुद्दे को केवल टाल रही थीं|
  • आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार
    • बैंकों द्वारा आस्ति गुणवत्ता समीक्षा के प्रति बेरुखी और घाटे को स्वीकार करने से बचना |
    • निजी क्षेत्र की आस्ति पुनर्निर्माण कंपनियों की असफलता :जो कुल एनपीए का केवल ५% का समाधान कर पायीं |
    • बैंक प्रबंधकों द्वारा 4Cs- courts, CVC, CBI,CAG तथा पक्षपात के आक्षेपों के डर से ऋणों को बट्टे खाते में डालने से बचना |
    • सरकार के पास वित्तीय संसाधनों की कमी और सार्वजनिक धन से सम्बंधित नैतिक जोखिम |

भविष्य पथ

  • अंतर्राष्ट्रीय अनुभव (दक्षिण पूर्व एशिया) से पता चलता है कि सरकारी सहयोग से ARC(आस्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ) एनपीए का समाधान कर सकती हैं |
  • आर्थिक समीक्षा द्वारा प्रस्तावित PARA बैंक (सार्वजनिक क्षेत्र आस्ति पुनर्वास एजेंसी ) भी एक उपाय हो सकता है |
  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता का उचित कार्यान्वयन |
  • बैंकों की कार्यप्रणाली का विराजनीतिकरण
  • PJ Nayak समिति की सिफारिशों का ठीक से कार्यान्वयन |
  • ऋण माफ़ी जैसी योजनायें न लायी जाएँ |

निष्कर्ष

इसका समाधान तीव्र आर्थिक वृद्धि में है | काफी सारा दोषपूर्ण ऋण व्यापार चक्र के कारण हुआ है और अब दुश्चक्र बन गया है | आर्थव्यवस्था को बढ़ने हेतु बैंकों को आर्थिक जरुरत के हिसाब से ऋण देना होगा | लेकिन चूँकि बैंक में पूंजी की कमी है अतः वे बड़े ऋण नहीं देना चाहते |

साथ ही एक बेहतर निजी ऋण पत्र बाज़ार की आवश्यकता है जहाँ सार्वजानिक तरीके से उनका क्रय  विक्रय हो सके | दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता से मदद मिलेगी लेकिन अल्पावधि में एनपीए का  कोई उपाय नहीं है | पुनर्पूंजीकरण का प्रभावी उपयोग हो ताकि अगले २ सालों में यह बैंकों को बिना अपने तुलनपत्र को नुक्सान पहुचाये ऋण वितरण में आसानी हो |


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