भ्रष्ट्राचार को निमंत्रण #59

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प्रश्न : इलेक्टोरल बांड क्या है? भारत में इस चुनावी बांड योजना क्यों आवश्यक है? वर्तमान में इसका प्रयोग कैसे होता है एवं इसकी क्या सीमाएं हैं? समझाएं

संदर्भ

देश में राजनीतिक फंडिंग प्रणाली में सुधार लाने और नकदी रहित अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाने के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान सरकार ने चुनावी बॉण्ड योजना की शुरुआत की थी। 2017 के आम बजट के दौरान घोषित की गई इस योजना का लक्ष्य सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का हिसाब रखना है।

क्या है इलेक्टोरल बॉण्ड?

  • यदि हम बॉण्ड की बात करें तो यह एक ऋण सुरक्षा है। चुनावी बॉण्ड का जिक्र सर्वप्रथम वर्ष 2017 के आम बजट में किया गया था।
  • दरअसल, यह कहा गया था कि आरबीआई एक प्रकार का बॉण्ड जारी करेगा और जो भी व्यक्ति राजनीतिक पार्टियों को दान देना चाहता है, वह पहले बैंक से बॉण्ड खरीदेगा फिर जिस भी राजनैतिक दल को दान देना चाहता है उसे दान के रूप में बॉण्ड दे सकता है।
  • राजनैतिक दल इन चुनावी बॉण्ड की बिक्री अधिकृत बैंक को करेंगे और वैधता अवधि के दौरान राजनैतिक दलों के बैंक खातों में बॉण्ड के खरीद के अनुपात में राशि जमा करा दी जाएगी।
  • गौरतलब है कि चुनावी बॉण्ड एक प्रॉमिसरी नोट की तरह होगा, जिस पर किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि चुनावी बॉण्ड को चेक या ई-भुगतान के ज़रिये ही खरीदा जा सकता है।

ज़रूरी है चुनावी बॉण्ड योजना?

  • राजनीतिक फंडिंग की पारंपरिक प्रणाली दान पर पर निर्भर रहती है। ये बड़े या छोटे दान राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं, समर्थकों, छोटे व्यवसायियों और यहाँ तक ​​कि बड़े उद्योगपतियों जैसे स्रोतों की एक व्यापक श्रृंखला से आते हैं।
  • चुनावी बॉण्ड का उद्देश्य राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले नकद व गुप्त चंदे के चलन को रोकना है।
  • जब चंदे की राशि नकदी में दी जाती है, तो धन के स्रोत के बारे में, दानकर्त्ता के बारे में तथा यह धन कहाँ खर्च किया गया, इसकी भी कोई जानकारी नहीं मिलती। इसलिये चुनावी बॉण्ड से वर्तमान प्रणाली में पारदर्शिता आएगी।
  • चुनावी बॉण्ड एक हज़ार रुपए, दस हज़ार रुपए, एक लाख रुपए, दस लाख रुपए और एक करोड़ रुपए के मूल्य में उपलब्ध होंगे। इन बॉण्ड की बिक्री वर्ष के चार महीनों-जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में 10 दिनों के लिये होगा।
  • इसी दौरान इन्हें खरीदा जा सकेगा। आम चुनाव के वर्ष में बॉण्ड खरीद की सुविधा 30 दिनों के लिये की जाती है।

electoral bond

  • दानकर्त्ता ये बॉण्ड एसबीआई की शाखाओं से खरीदकर किसी भी दल को दान कर सकेंगे। दानकर्त्ता चुनाव आयोग में पंजीकृत उसी राजनीतिक दल को इन्हें दान में दे सकते हैं, जिन दलों ने पिछले चुनावों में कुल मतों का कम-से-कम 1 प्रतिशत हासिल किया है।
  • बॉण्ड से मिलने वाली चंदे की राशि संबंधित दल के अधिकृत बैंक खाते में जमा होगी। इलेक्टोरल बॉण्ड की वैलिडिटी सिर्फ 15 दिनों की होगी। बॉण्ड को कम अवधि के लिये वैध रखे जाने के पीछे उद्देश्य है इसके दुरूपयोग को रोकना, साथ ही राजनीतिक दलों को वित्त उपलब्ध कराने में कालेधन के उपयोग पर अंकुश लगाना।
  • इसके ज़रिये पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी। एक ओर बैंक इस बात से अवगत होगा कि कोई चुनावी बॉण्ड किसने खरीदा और दूसरे, बॉण्ड खरीदने वाले को उसका उल्लेख अपनी बैलेंस शीट में भी करना होगा।

क्या है स्थिति

  • ऑनलाइन या चेक के द्वारा दिये गए दान राजनीतिक दलों को दान करने का एक आदर्श तरीका है। हालाँकि, ये तरीके भारत में बहुत लोकप्रिय नहीं हुए हैं क्योंकि इन तरीकों में दानकर्त्ता की पहचान का खुलासा हो जाता है।
  • चुनावी बॉण्ड योजना की परिकल्पना राजनीतिक फंडिंग प्रणाली में पर्याप्त पारदर्शिता लाना रही है। कोई दाता केवल एक बैंकिंग इंस्ट्रूमेंट द्वारा ही निर्दिष्ट बैंक से चुनावी बॉण्ड खरीद सकता है। जिसके बाद खरीददार को अपने खातों में उन राजनीतिक बॉण्ड की संख्या का खुलासा करना होगा जिन्हें उन्होंने खरीदा है।
  • इस योजना की असफलता स्पष्ट है और इसके परिणाम अत्यंत हानिकारक हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, पूर्व चुनाव आयुक्तों, पत्रकारों आदि जैसे कई व्यक्तियों से आलोचनाएँ सुनने को मिल रही हैं।

कमियाँ

  • इस योजना के कई स्याह पक्ष हैं क्योंकि पार्टियों के व्यय की कोई तय सीमा नहीं है और चुनाव आयोग इसकी निगरानी नहीं कर सकता है। यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि जो राशि आ रही है वह काला धन है या सफेद, क्योंकि दाता गोपनीय है।
  • यहाँ तक ​​कि विदेशी धन भी आ सकता है और आर्थिक रूप से कंगाल हो रही कोई कंपनी भी पैसा दान सकती है। इन परिस्थितियों में सबसे पहले यह प्रतीत होता है कि यह योजना वास्तव में अपने शुरुआती उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाई है।
  • चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि उक्त योजना दाता की पूरी गुमनामी की सुविधा प्रदान करती है और न तो बॉण्ड के खरीदार और न ही दान प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टी की पहचान का खुलासा करने को बाध्य है।
  • इसलिए यह जा सकता है की किसी कंपनी के शेयरधारक अपनी कंपनी द्वारा दिए जाने वाले दान से अनजान होंगे। इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि मतदाताओं को भी यह नहीं पता होगा कि कैसे और किसके माध्यम से किसी राजनीतिक पार्टी को फंडिंग मिली है।
  • इसके अतिरिक्त, किसी दानकर्त्ता कंपनी को दान करने से कम से कम तीन साल पहले अस्तित्व में होने की पूर्व शर्त को भी हटा दिया गया है। यह शर्त शेल कंपनियों के माध्यम से काले धन को राजनीति में खपाने से रोकती थी।

आगे की राह

  • इसमें कोई संदेह नहीं है कि संविधान में समानता और अभिव्यक्ति की आज़ादी में ज्ञान और जानकारी का अधिकार भी अंतर्निहित है।
  • विभिन्न पार्टियों को फंडिंग देने वालों की पहचान के बारे में पूर्ण ज्ञान के बिना यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई व्यक्ति राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में अर्थपूर्ण रूप से भाग ले सकता है।
  • भारत के गणतंत्र की संरचना के निर्माण में ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ के सिद्धांत के माध्यम से समानता का संस्थागत होना महत्त्वपूर्ण है।
  • जब उस एक व्यक्ति के एक वोट की शक्ति राजनीतिक फंडिंग में अस्पष्टता की वज़ह से धूमिल हो जाएगी है, तब लोकतंत्र पूरी तरह से अपने आंतरिक मूल्य को खो देगा।
  • अतः चुनावी बॉण्ड योजना के संदर्भ में दो संभावनाओं की बात की जा सकती है-

 पहली, सरकार संविधान को नहीं समझती है;
 दूसरी, समझती है, और स्पष्ट रूप से इसकी इसकी अवहेलना कर रही है।


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