UKPCS Answer writing practice History #26

The most important and most neglected part for Civil Services Preparation is answer writing. It is not about HOW MUCH YOU STUDY but CAN YOU WRITE within word limit and time frame. After UPPCS daily answer writing practice, ORACLE IAS comes out with new initiative UKPCS DAILY ANSWER WRITING PRACTICE.)

1)What were the main causes and consequences of bank nationalisation? (125 words)
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कारण और प्रभाव लिखें|
2)Critically examine the role of socio religious reform movements of 19 century in the the rise of communism in modern india. (250 words)
आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता के उभार में उन्नीसवीं सदी के सुधार आंदोलन की भूमिका की समालोचनात्मक परीक्षा करें|

 

  1. Bank Nationalization was done in two waves in 1969 and 1980. The main reasons for the step were:-

  • The private banks were controlled by a small group of industrialists and gave credit mostly to big businesses only.
  • These banks ignored the agriculture sector for credit, and the government wanted to enforce priority sector lending norms.
  • In past many private banks had failed and people lost their deposits.
  • To ensure that the banks open branches in rural areas which were underserved due to less profits.

The main effects were:-

  1. Expansion of banks to semi-urban and rural India.
  2. Agriculture and MSME sector was given credit in Priority Sector Lending but this was availed by only well off farmers.
  3. Due to trade union activity and inefficiency, Nationalized Banks could not grow at par with private sector banks after economic reforms.
  4. Too much government interference and crony capitalism.

1.बैंकों का राष्ट्रीयकरण दो बार में, 1969 और 1980 में, किया गया | इस कदम के पीछे मुख्य कारण थे :-

  • निजी बैंक उद्योगपतियों के एक छोटे से समूह द्वारा नियंत्रित थे और बड़े व्यवसायों को ही ऋण देते थे |
  • ये बैंक कृषि क्षेत्र को ऋण नहीं देते थे और सरकार प्राथमिक क्षेत्र में ऋण देने के लिए नियम लागु करना चाहती थी |
  • पूर्व में कई बैंक असफल हो चुके थे जिसमे जनता का जमा धन डूब गया था |
  • यह सुनिश्चित करने हेतु कि बैंक ग्रामीण क्षेत्रों, जहाँ कम लाभ के कारण कम शाखाएं थीं, में शाखाएं खोलें |

इसके प्रभाव निम्न हैं :-

  • बैंकों ने कस्बों और गाँवों में भी शाखाएं खोलीं |
  • कृषि और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को प्राथमिक क्षेत्र के तहत ऋण मिला, लेकिन इसका फायदा पहले से समृद्ध किसान ही ले पाए |
  • श्रमिक संघों और अक्षमता के कारण आर्थिक सुधारों के बाद राष्ट्रीयकृत बैंक निजी बैंकों की गति से वृद्धि नहीं कर पाए |
  • सरकार का अत्यधिक दखल और सहचर पूंजीवाद |

 

  1. Communalism is an ideology that believes in the interests of two different religious groups to be different and in conflict with each other. Aided by the British, it plagued the national movement in the 20th century and finally resulted in the division of the country on the basis of religion.

19th century reform movements started with ideals of humanism, rationalism and modern      ideas. Examples of such movements include Brahm Samaj, Young India etc. These         movements, however could not gain     mass support and later movements such as Arya        Samaj, Devbandi, Wahabi, Ramakrishna         Mission etc. were found. These were based on   religious books and their interpretation and   opposed social evils on the basis of religious        arguments. These are called revivalist movements.

Arguments that social movements fanned communalism:

  1. The revivalist movements stressed on religious education and living according to one’s own religion. This fanned religiosity and later communalism. For example to counter Tableeghi Jamaat, Arya Samaj started Shuddhi movement and Protection of cow movement, which created conflict and several riots.
  2. Initially modernist movements like Aligarh movement also turned communal in later years to get patronage of English.

Arguments that social movements did not fan communalism:

  1. It is pointed out that the communal riots also happened in places where there was no or little effect of such reform movements.
  2. During movements specially during Khilafat-Non Cooperation, there was great unity seen between Hindus and Muslims.
  3. Despite being influenced by these movements, many national leaders like Maulana Azad, Nehrus(Theosophical Society) etc and Gandhiji can not be termed communal.
  4. It is also pointed out that communalism really gathered pace after British made efforts to divide the people on religious lines for sustainability of their rule. They supported establishment of Muslim league and Hindu Mahasabha and gove them all help.

Thus revivalist social movements did promote religiosity but without British interference,       communalism might have been contained. The tragedy of division of India, biggest example          of communal carnage,  could only become possible due to British policy.

2.साम्प्रदायिकता एक विचारधारा है जिसके अनुसार दो विभिन्न धार्मिक समूहों के हित एक दूसरे से अलग और संघर्षरत हैं | ब्रिटिश शासकों की मदद से सांप्रदायिक विचारधारा ने २०वी सदी में राष्ट्रीय आन्दोलन को कमज़ोर किया जिसकी परिणिति देश के विभाजन में हुई |

१९वी सदी के सुधार आन्दोलन मानववाद, तर्कवाद एवं आधुनिक विचारों से उत्पन्न हुए | इसके उदाहरणब्रह्म समाज, तरुण भारत आदि में देखे जा सकते हैं | लेकिन ये आन्दोलन जन समर्थन प्राप्त नहीं कर सके और अन्य आन्दोलन जैसे आर्य समाज, देवबंदी, वहाबी, रामकृष्ण मिशन आदि की स्थापना हुई | ये धार्मिक पुस्तकों पर आधारित थे और इन्होने सामाजिक बुराइयों का विरोध धार्मिक आधार पर ही किया | इन आंदोलनों को पुनरुत्थानवादी कहते हैं |

सामाजिक आंदोलनों द्वारा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के पक्ष में निम्न तर्क हैं :-

  1. पुनरुत्थानवादी आन्दोलनों ने धार्मिक शिक्षा और अपने धर्म के अनुसार जीने पर बल दिया | इससे धार्मिकता और बाद में साम्प्रदायिकता में वृद्धि हुई| उदाहरण के लिए तबलीगी जमात के विरोध में आर्य समाज ने शुद्धि और गौरक्षा आन्दोलन चलाये जिससे मतभेद और दंगे बढे |
  2. अलीगढ आन्दोलन जैसे आन्दोलन जो शुरू में आधुनिक थे, बाद में अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए सांप्रदायिक हो गए |

 

सामाजिक आंदोलनों द्वारा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा न देने के पक्ष में निम्न तर्क हैं :-

  1. यह देखा जा सका है कि ऐसी जगहों पर जहाँ इन आन्दोलनों का प्रभाव कम था, वहाँ भी सांप्रदायिक दंगे हुए |
  2. कई आंदोलनों, विशेषकर खिलाफत-असहयोग के दौरान हिन्दुओं और मुस्लिमों में बहुत एकता देखी गयी |
  3. इन आंदोलनों से प्रभावित होने के बावजूद कई नेता जैसे मौलाना आजाद, नेहरु और गांधीजी सांप्रदायिक नहीं कहे जा सकते |
  4. यह भी देखा गया की साप्रदायिकता में उफान तब आया जब अंग्रेजों ने फुट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण प्रारंभ किया | उन्होंने मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की स्थापना का समर्थन किया और इन संस्थाओं को पूरी सहायता की |

अतः पुनरुत्थानवादी सामाजिक आंदोलनों ने धार्मिकता को तो बढ़ावा दिया लेकिन अंग्रेजों की नीति के बिना साम्प्रदायिकता को रोका जा सकता था | साम्प्रदायिकता जनित सबसे बड़ी त्रासदी—भारत का विभाजन- अंग्रेजों की नीति के कारण ही संभव हुआ |