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What is NPA

  • A loan is declared NPA if the borrower fails to pay interest/principle for a period of 90 days.
  • For agricultural loan it depends on cropping cycle.


  • According to the official figures, the gross NPA of PSBs and private sector banks is 7.34 lakh crore and 1.38 lakh crore rupees respectively.(~9.6 lakh crore)
  • The total NPA is ~9.1 % of total assets (12% for PSBs).
  • Out of 9.6 lakh crore, 10 companies constitute ~4 lakh crore.
  • Within the BRICS it is highest for Russia. India ranks second.

Most Vulnerable sector

RBI’s financial stability report names the basic metal and cement industries as most indebted with construction, infrastructure and automobile industry also accounting for sizeable chunks of banks’ NPAs.

Reasons for NPA



  • The funds borrowed by the company for a particular purpose were diverted.
  • Business failures.
  • Willful defaulters constitute ~21% of total NPAs of PSBs
  • Stressed sectors like Electricity (state electricity boards), Steel, Infrastructure, textiles, mines etc.
  • General Economic slowdown due to demonetization and tardy implementation of GST.




  • Poor credit appraisals by banks.
  • PSBs provide loans under various compulsion that might not have sound business logic.
  • Lending under political pressure egs. PSBs compelled to give loans to stressed sectors like infrastructure.
  • Aggressive lending during economic upturn without due diligence.
  • Accounting tricks: Asset quality review unearthed the problem of subdued NPAs. These NPAs were hidden in the bank’s balance sheet but were not reflected properly. Hence the NPAs were being accumulated over the years.

Effect of NPA on Economy


  • NPAs shrink bank resources, reduce lending power as the bank have to keep more resources for accumulating losses. (One leg of Twin balance sheet problem)
  • Banks don’t give loans to companies in fear of loss. (Other leg of Twin balance sheet problem).
  • Put pressure on government to infuse capital. (fiscal deficit breach)
  • All the above lead to macro economic instability and economic slowdown.

Steps by Government /RBI


  • The government has announced 2.11 lakh crore of  bank re-capitalization funds.(Indhradhanush, Gyan sangam)
  • PJ Nayak committee on bank governance recommendation being implemented. Egs. Bank board Bureau created: Step towards letting PSBs be professionally and independently managed.
  • Insolvency and Bankruptcy code (2016) passed for fast resolution.
  • The RBI has taken many initiatives: S4A scheme, 5:25 scheme for infra loans, Strategic debt restructuring


Non resolution of NPA issue:


  • RBI measures did not meet success: CDR, SDR, S4A, 5-24 schemes were just deferring the NPA issue.
  • As per economic survey
    • Poor loss recognition by banks and reluctant to conduct Asset quality review
    • Failure of Private sector ARCs (asset reconstruction companies): Were only able to resolve 5 % of total NPA.
    • Reluctance to write down loans: Bank managers afraid of accusation of favoritism and 4Cs- courts, CVC, CBI,CAG which  is leading to ever greening of loans.
    • Lack of fiscal space for the government and ‘moral hazard’ associated with using public money.


  • International experience (eg. SE ASIA) show that ARCs with government support can assist in resolving NPA issue. The PARA bank (Public Sector Asset Rehabilitation Agency) as recommended by the Economic Survey can be tried.
  • Proper implementation of Bankruptcy and insolvency Code.
  • Strict action against willful defaulters.
  • Depolitisation of banking operation: Implementing PJ Nayak committee recommendation in letter and spirit.
  • Loan waivers and other popular schemes should be avoided.


The solution will lie at economy growing at a fast pace. Much of the bad debt has arisen because of business cycle. It has become a vicious cycle. For economy to turnaround, the banks have to lend and bring investments which the economy requires. But as there is a shortage of capital in the banking industry, there will be hesitation in banks to fund the large products.

Also, there is need for better private bond market where not banks finance it but they are issued publicly. Insolvency and bankruptcy code is going to help fighting the NPAs. But there is no short term solution to the NPAs. The re-capitalization should be effectively utilized so that in next 2 years, it will help banks in lending without injuring the balance sheet.


विषय : एनपीए की समस्या


एनपीए क्या है

  • कोई ऋण तब एनपीए घोषित होता है जब कर्जदार 90 दिन तक लगातार मूलधन या ब्याज नहीं दे पाता |
  • कृषि ऋणों के लिए ये फसल चक्र पर निर्भर करता है |
  • कुछ तथ्य (आंकड़े )
  • आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सरकारी और निजी बैंकों में एनपीए क्रमशः लगभग34 लाख करोड़ और 1.38 लाख करोड़ है .(कुल लगभग 9.6 लाख करोड़ )
  • कुल एनपीए सारी आस्तियों का लगभग ~9.1 % है | (सरकारी बैंकों में 12%).
  • कुल 6 लाख करोड़ में से 10 व्यापार समूह  ~4 लाख करोड़ के कर्जदार हैं |
  • ब्रिक्स (BRICS) में ये रूस में सर्वाधिक है | भारत का दूसरा स्थान है |


सर्वाधिक जोखिम वाले क्षेत्र

रिज़र्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट  मूलभूत  धात्विक और सीमेंट उद्योगों को सर्वाधिक ऋण ग्रस्त बताती है | साथ ही निर्माण, आधारिक संरचना और वाहन उद्योग भी एनपीए के लिए काफी जिम्मेदार हैं |


एनपीए के कारण

उद्यम पक्ष के कारण:


  • कंपनी द्वारा किसी प्रयोजन से लिया गया ऋण किसी अन्य कार्य में खर्चा होना
  • व्यवसाय का दिवालिया हो जाना
  • सरकारी बैंकों में कुल एनपीए का लगभग ~21% ऐसे बकायेदारों का है जो क़र्ज़ चुकाने में अनिच्छुक हैं |
  • बिजली(राज्य बिजली बोर्ड ), स्टील, आधारिक संरचना , वस्त्र, खान जैसे कठिनाई से गुजर रहे क्षेत्र |
  • वस्तु व सेवा कर तथा विमुद्रीकरण के कारण व्यापक आर्थिक मंदी |


बैंक पक्ष के कारण :

  • ऋण देने के समय साख का त्रुटिपूर्ण मूल्याङ्कन
  • सरकारी बैंक कई बाध्यताओं के कारण ऐसे ऋण भी देते हैं जहाँ कोई शुद्ध व्यापारिक कारण ऋण देने का नहीं है |
  • राजनितिक दबाव में ऋण देना | जैसे की सरकारी बैंक आधारिक संरचना जैसे क्षेत्र में भी ऋण देने को बाध्य थे |
  • आर्थिक समृद्धि के समय बिना सम्यक जांच पड़ताल के ताबड़तोड़ ऋण वितरण |
  • लेखा में हेरफेर: आस्ति गुणवत्ता समीक्षा ने छुपे हुए एनपीए की समस्या को उजागर किया | ये एनपीए बैंक के तुलनपत्र में ठीक से नजर नहीं आते थे और साल दर साल बढ़ते चले गए थे |



  • एनपीए का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव


  • एनपीए बैंक के संसाधन घटाते हैं और उनकी ऋण वितरण क्षमता को प्रभावित करते हैं क्यूंकि बैंक को घाटा पूरा करने हेतु संसाधन रखने पड़ते हैं |(दोहरे तुलनपत्र की समस्या का एक पक्ष )
  • बैंक कंपनियों को घाटे के डर से ऋण वितरित नहीं करते (दोहरे तुलनपत्र की समस्या का दूसरा पक्ष).
  • सरकार पर पुनर्पूंजीकरण का दबाव बढ़ता है |(वित्तीय घाटा बढ़ता है )
  • उपरोक्त सभी स्थितियां आर्थिक अस्थिरता और मंदी के लिए उपयुक्त परिस्थितियों का निर्माण करती हैं |



  • सरकार व रिज़र्व बैंक द्वारा उठाये गए कदम


  • सरकार ने बैंकों में रु. २.11 लाख करोड़ के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा की गयी है |(इन्द्रधनुष, ज्ञान संगम )
  • बैंक प्रशासन पर बनी PJ Nayak समिति की सिफारिशें कार्यान्वित की जा रही हैं | उदाहरण :- बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना से सरकारी बैंकों के पेशेवर और स्वतंत्र प्रबंधन में सहायता होगी |
  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता २०१६ को द्रुत समाधान के लिए लाया गया है |
  • रिज़र्व बैंक ने कई पहल की हैं जैसे S4A योजना , आधारिक ऋणों हेतु 5:25 योजना , सामरिक ऋण पुनर्गठन आदि .


एनपीए मुद्दे का समाधान न होने के कारण  :


  • रिज़र्व बैंक के कदमों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली CDR, SDR, S4A, 5-24 आदि योजनायें एनपीए मुद्दे को केवल टाल रही थीं|
  • आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार
    • बैंकों द्वारा आस्ति गुणवत्ता समीक्षा के प्रति बेरुखी और घाटे को स्वीकार करने से बचना |
    • निजी क्षेत्र की आस्ति पुनर्निर्माण कंपनियों की असफलता :जो कुल एनपीए का केवल ५% का समाधान कर पायीं |
    • बैंक प्रबंधकों द्वारा 4Cs- courts, CVC, CBI,CAG तथा पक्षपात के आक्षेपों के डर से ऋणों को बट्टे खाते में डालने से बचना |
    • सरकार के पास वित्तीय संसाधनों की कमी और सार्वजनिक धन से सम्बंधित नैतिक जोखिम |


  • भविष्य पथ
  • अंतर्राष्ट्रीय अनुभव (दक्षिण पूर्व एशिया) से पता चलता है कि सरकारी सहयोग से ARC(आस्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ) एनपीए का समाधान कर सकती हैं |
  • आर्थिक समीक्षा द्वारा प्रस्तावित PARA बैंक (सार्वजनिक क्षेत्र आस्ति पुनर्वास एजेंसी ) भी एक उपाय हो सकता है |
  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता का उचित कार्यान्वयन |
  • बैंकों की कार्यप्रणाली का विराजनीतिकरण
  • PJ Nayak समिति की सिफारिशों का ठीक से कार्यान्वयन |
  • ऋण माफ़ी जैसी योजनायें न लायी जाएँ |


  • निष्कर्ष

इसका समाधान तीव्र आर्थिक वृद्धि में है | काफी सारा दोषपूर्ण ऋण व्यापार चक्र के कारण हुआ है और अब दुश्चक्र बन गया है | आर्थव्यवस्था को बढ़ने हेतु बैंकों को आर्थिक जरुरत के हिसाब से ऋण देना होगा | लेकिन चूँकि बैंक में पूंजी की कमी है अतः वे बड़े ऋण नहीं देना चाहते |

साथ ही एक बेहतर निजी ऋण पत्र बाज़ार की आवश्यकता है जहाँ सार्वजानिक तरीके से उनका क्रय  विक्रय हो सके | दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता से मदद मिलेगी लेकिन अल्पावधि में एनपीए का  कोई उपाय नहीं है | पुनर्पूंजीकरण का प्रभावी उपयोग हो ताकि अगले २ सालों में यह बैंकों को बिना अपने तुलनपत्र को नुक्सान पहुचाये ऋण वितरण में आसानी हो |


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